Wednesday, December 16, 2009

अब नहीं डराते वो चेहरे

एक ऐसे शहर में जहां आप अकेले रह रहे हों, बहुत कम जान-पहचान वाले हों, वहां किसी दूसरे की थोड़ी सी भी मदद भगवान के हाथ से कम नहीं लगती। अगर किसी से दो-चार मुलाकातों में जान-पहचान हो जाए और वो आपकी रोजमर्रा की मुसीबतों को थोड़ा हल्का करे, तो सच में कोई भी अहसानमंद हो जाए। पर शायद जिंदगी अतनी आसान भी नहीं है।

कुछ अनचाहे वाकयों के बाद अब मुझे दिल्ली में अकेले रहते हुए अपनी एक टीचर का तकिया कलाम बहुत याद आता है। 'देयर इज नो फ्री लंचेस' सच भी है, इस दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता। आज आपकी मदद करने वाला कोई हाथ अगर आगे आता है, तो बदले में उसे भी कुछ चाहिए होता है। और कुछ नहीं तो चाक अनचाहे आप उसके मनोरंजन का जरिया तो जरूर बन जाते हैं। हो सकता है कई लोगों का तजुर्बा मुझसे जुदा हो।

पढ़ाई पूरी करने के बाद मेरी पहली नौकरी दिल्ली में ही लगी। आज मैं दूसरे संस्थान में काम कर रही हूं। छोटे से शहर से दिल्ली आने के बाद करीब 9 महीने मैंने सिर्फ हॉस्टल में ही बिताए। पर पढ़ाई पूरी होने के बाद मुझे हॉस्टल से बाहर रहने को मजबूर होना पड़ा। पर मैं अकेले किसी फ्लैट में रहने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। इसलिए एक गल्र्स पीजी का रास्ता पकड़ा। मेरा पुराना ऑफिस दिल्ली के न्यू फ्रेंड्ïस कॉलोनी में था। पीजी से बस से वहां पहुंचने में करीब 40-45 मिनट लग जाते हैं। मैंने उस ऑफिस में करीब 7 महीने काम किया था। एक ही रास्ते से रोज का आना-जाना। उस रूट पर चलने वाली लगभग सारी बसों में मेरी जान-पहचान हो गई थी। मेरी तरह रोज सफर करने वालों से भी और कंडक्टरों से भी। पर मेरी कोशिश हमेशा होती थी कि मैं थोड़ा सीमित ही रहूं। अनजाने शहर में बहुत ज्यादा घुलना-मिलना ठीक नहीं होता। खैर कंडक्टरों से जान-पहचान का फायदा यह मिलता था कि मुझे बैठने को सीट मिल जाती थी। और राहगीरों से कुछ खुशनुमा पल। लेकिन धीरे-धीरे इस पहचान का नुकसान मेरी समझ मे आने लगा। जानने पहचानने वाले लोग बस स्टॉप पर इंतजार करते थे। जब आपके ना चाहने पर कोई आपमें ज्यादा दिलचस्पी ले और जरूरत से ज्यादा चिंता करने वाला बने तो, निजता में खलल लगती है। कुछ ऐसा ही मुझे लगता था। मैं इसलिए अपने समय से कुछ पहले या कुछ देर से घर से या ऑफिस से निकलने लगी। ताकि उन लोगों से पीछा छूटे। पीछा छूट भी गया। पर मुसीबत बस में खड़ी हो गई। मैं पहले जिस बस से जाती थी, उसके बाद वाले में जाने लगी, तो पहली बस का कंडक्टर दूसरी बस के कंडक्टर से भिड़ गया। मुद्दा, तुमने मेरी सवारी कैसे छिनी? मुझे समझ नहीं आ रहा था, बस मेरी सेवा के लिए है या मैं बस की जागीर। चलो ये मसला भी सुलझ गया। नई बस में एक तय सीट मुझे मिलने लगी। पर उस दिन बहुत बुरा लगा जब मेरी सीट खाली करवाने पर एक जनाब कंडक्टर से भिड़ गए। मुझे भी इसमें उन जनाब की कोई गलती नहीं लगी। आखिर किसी एक सवारी की विशेष खातिरदारी क्यों। मुझे यह एहसास हुआ कि उस बस से रोज आने-जाने वाले दूसरे लोगों को ऐसी कोई विशेष सेवा नहीं मिलती थी। शायद मुझे इसलिए मिली कि मैं एक लड़की हूं।

रोज-रोज के झंझटों से तंग आकर मैंने ब्लू लाइन की बजाए डटीसी का रास्ता पकड़ा। ऑफिस से लौटते समय ब्लू लाइन के ठीक बाद डीटीसी मिला करती थी। मेरे सामने से ब्लू लाइन निकल जाती पर मैं नहीं चढ़ती। स्टॉप पर सभी चढऩे वालों को पुकारने में मेरे लिए विशेष आवाज होती थी। 'मैडम आ जाओ सीट दिला दूंगा।' मेरा बस में न चढऩा उस बस के कंडक्टरों में चिढ़ भरता गया। और इसका नतीजा मुझे भुगतना भी होता था। ऑफिस से निकलने में जरा सी देर हो जाए और डीटीसी ब्लू लाइन से पहले निकल जाए, तो मजबूरन मुझे ब्लू लाइन में ही चढऩा पड़ता था। और वो दिन किसी पहाड़ से कम नहीं होता था। चढऩे के साथ कोई न कोई फबती। 'लगता है आज डीटीसी नहीं आई, 'शायद ऑफिस में देरी हो गई', 'यार डीटीसी में भी भीड़ होने लगी है भाई'। कई बार ऐसी बातों को अनसुना कर देती थी तो कई बार बात चुभ जाती तो पलट कर जवाब दे देती। पर रोज-रोज उसी रास्ते जाना-आना है, यह सोचकर ज्यादा उलझने से बचती थी। जानबूझकर मुसीबत बढ़ाना नहीं चाहती थी।

आज मैं दूसरे संस्थान में काम कर रही हूं। बहुत खुश हूं और सुकून भी है। संस्थान बदलने के पीछे रास्ते के ये बुरे तजुर्बे कहीं वजह नहीं बने। हां, पर इतना जरूर है करियर में तरक्की की खुशी में कहीं न कहीं इस बात की भी खुशी थी कि अब उन चेहरों को दोबारा नहीं देखना होगा।

1 comment:

  1. hamari zindagi kitni ajeeb hoti hai na,kabhi kabhi jaane pehchaane raste bhi hame apni manzil tak nahi le jaa pate, hame phir un anjaan rasto ki talaash hoti jo hame hamari zindagi hamare shartoo pe jeene me madad kare aur phir un rastoo pe khone ka khauff bhi nahi hota- aapki babu tuli

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